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गोडसे ने उस दिन कोर्ट में ऐसा क्या कहा कि न्यायाधीश तक के आंखों में आंसू आ गए? जानिए वो भाषण जिसने पूरी अदालत को हिला दिया

नाथूराम गोडसे के अदालती भाषण ने कैसे न्यायाधीश जी.डी. खोसला समेत पूरी अदालत को भावुक कर दिया था। जानिए उस ऐतिहासिक दिन की पूरी कहानी।

आज से 77 साल पहले 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद जो मुकदमा चला, उसमें हुई एक अनोखी घटना आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। नाथूराम गोडसे का वह अदालती भाषण जिसे सुनकर न्यायाधीश जी.डी. खोसला सहित पूरी अदालत भावुक हो गई थी, आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

शिमला स्थित पंजाब हाई कोर्ट के न्यायाधीश जी.डी. खोसला ने अपनी पुस्तक “The Murder of the Mahatma” में उस दिन की घटना का जीवंत वर्णन किया है। न्यायाधीश खोसला के अनुसार, जब नाथूराम गोडसे ने अपना पांच घंटे का भाषण समाप्त किया तो पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया था। महिलाएं रो रही थीं और पुरुष अपने रूमाल ढूंढ रहे थे।

न्यायाधीश का भावुक प्रतिक्रिया – क्या था उस दिन का माहौल?

न्यायाधीश खोसला ने अपनी किताब में लिखा है कि गोडसे के भाषण के बाद अदालत में गहरी चुप्पी छा गई थी। “दर्शक दृश्यमान और श्रव्य रूप से प्रभावित हुए थे। जब वह बोलना बंद कर दिया तो गहरा सन्नाटा था। कई महिलाएं रो रही थीं और पुरुष खांस रहे थे और अपने रूमाल खोज रहे थे।”

न्यायाधीश खोसला ने इस दृश्य का वर्णन करते हुए कहा था कि “यह सन्नाटा कभी-कभार सुनाई देने वाली दबी हुई सुसकी या दबी हुई खांसी की आवाज से और भी गहरा हो जाता था। मुझे लगा जैसे मैं किसी मेलोड्रामा या हॉलीवुड फीचर फिल्म के किसी दृश्य का हिस्सा बन रहा हूं।”

इतिहास की वह अनोखी घटना जब जज भी हुए भावुक

न्यायाधीश खोसला ने अपनी पुस्तक में स्पष्ट रूप से लिखा है कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों से जूरी का काम लिया जाता और उनसे गोडसे के मामले में फैसला देने को कहा जाता, “तो मुझे कोई संदेह नहीं है कि वे भारी बहुमत से ‘निर्दोष’ का वर्डिक्ट देते।”

लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायाधीश खोसला ने यह भी कहा था कि गोडसे के भाषण का “दर्शकों पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा था कि अगर उन लोगों को न्यायदान का काम सौंपा जाता तो निस्संदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्णय देते।”

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गोडसे के भाषण की मुख्य बातें – क्या कहा था उस दिन?

नाथूराम गोडसे ने 8 नवंबर 1948 को अदालत में अपना 150 पैराग्राफ का बयान पढ़ा था। इस भाषण में उन्होंने अपने कार्य के कारण गिनाए थे। गोडसे ने कहा था:

“गांधी जी ने देश की जो सेवा की है उसके लिए मैं उनका आदर करता हूं। उन पर गोली चलाने के पूर्व मैं उनके सम्मान में इसीलिए नतमस्तक हुआ था। किंतु जनता को धोखा देकर पूज्य मातृभूमि के विभाजन का अधिकार किसी बड़े से बड़े महात्मा को नहीं है।”

गोडसे ने आगे कहा था, “गांधी जी ने देश को छल कर देश के टुकड़े किए। क्योंकि ऐसा न्यायालय या कानून नहीं था जिसके आधार पर ऐसे अपराधी को दंड दिया जा सकता, इसीलिए मैंने गांधी को गोली मारी।”

देश विभाजन पर गोडसे का तर्क

गोडसे ने अदालत में कहा था कि “15 अगस्त 1947 को छल पूर्वक पाकिस्तान स्वीकार कर लिया गया। पंजाब, बंगाल, सीमा प्रांत और सिंध के हिंदुओं का कोई विचार नहीं किया गया।”

उन्होंने यह भी कहा कि “पाकिस्तान बनाने के बाद कांग्रेस सरकार पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा करती तो मेरा क्रोध शांत हो जाता। मैं नहीं देख सकता था कि जनता को धोखा दिया जाए।”

अनशन और 55 करोड़ रुपए का मामला

गोडसे ने अपने भाषण में गांधी के अनशन का विशेष रूप से उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि “13 जनवरी 1948 को मुझे पता चला कि गांधी जी ने मृत्यु तक अनशन करने का निर्णय लिया है।”

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“भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ न देने का निर्णय जनता के प्रतिनिधि होने के नाते किया था, लेकिन गांधी जी के अनशन ने इस निर्णय को बदल दिया। तब मुझे यह ज्ञात हुआ कि गांधी जी की पाकिस्तान परस्ती के आगे जनता के मत का कोई महत्व नहीं है।”

मस्जिदों से शरणार्थियों को निकालने का मामला

गोडसे ने अदालत में उस दिन का जीवंत वर्णन किया जब गांधी के अनशन के कारण मस्जिदों से हिंदू शरणार्थियों को निकाला गया था। उन्होंने कहा:

“वे शीत के दिन थे। उस दिन वर्षा हो रही थी। ऐसी असाधारण सर्दी और वर्षा में निराश्रित शरणार्थियों के कुटुंब के कुटुंब मस्जिदों से सर्दी के मारे कांपते हुए निकाले गए। मैंने यह दृश्य अपनी आंखों से देखा जिसे देखकर कठोर से कठोर व्यक्ति का हृदय भी पिघल जाता।”

न्यायाधीश की आंतरिक द्वंद्व

न्यायाधीश खोसला ने अपनी पुस्तक में बताया कि गोडसे के भाषण के दौरान उन्होंने एक-दो बार उसे रोकने की कोशिश की थी, लेकिन उनके सहयोगी न्यायाधीश और दर्शक गोडसे को सुनना चाहते थे।

खोसला ने लिखा है कि उस समय उन्होंने अपने मन में सोचा था, “यह व्यक्ति जल्द ही मरने वाला है। इसमें अब कोई हानि करने की शक्ति नहीं है। इसे अंतिम बार अपनी भावनाएं व्यक्त करने दी जानी चाहिए।”

इतिहास में दर्ज वह अनोखा न्यायालयीन दृश्य

यह घटना न्यायालयीन इतिहास में अनोखी मानी जाती है जब एक अभियुक्त के भाषण ने पूरी अदालत को इस कदर प्रभावित किया हो। न्यायाधीश खोसला के अनुसार, गोडसे ने अपनी लेखन और वक्तृत्व कला का पूरा उपयोग किया था।

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खोसला ने लिखा है कि “गोडसे ने भगवद्गीता के श्लोकों का पाठ करते हुए अपना भाषण समाप्त किया और हिंदुओं से अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक की आहुति देने की भावनात्मक अपील की।”

न्यायिक प्रक्रिया और अंतिम निर्णय

इस भावनात्मक भाषण के बावजूद न्यायाधीशों ने अपना निष्पक्ष फैसला दिया। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को मृत्युदंड दिया गया, जबकि अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में गोडसे और आप्टे को फांसी दी गई। फांसी के समय गोडसे के हाथ में गीता, अखंड भारत का नक्शा और भगवा झंडा था।

आधुनिक संदर्भ में इस घटना का महत्व

यह घटना आज भी कानूनी और न्यायिक हलकों में चर्चा का विषय है कि कैसे एक अभियुक्त का भाषण न्यायाधीशों तक को प्रभावित कर सकता है। हालांकि न्यायाधीश खोसला ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि गोडसे निर्दोष था या उन पर किसी सरकारी दबाव का प्रभाव था।

निष्कर्ष

यह ऐतिहासिक घटना दिखाती है कि न्यायालय में भावनाएं कैसे न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन साथ ही यह भी दिखाती है कि न्यायाधीशों ने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को निष्पक्ष न्याय के रास्ते में नहीं आने दिया। आज 77 साल बाद भी यह घटना भारतीय न्यायिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है।

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