जॉली एलएलबी 3 रिव्यू: किसानों की आवाज़ को मिला बॉलीवुड का कोर्टरूम
"जॉली एलएलबी 3 रिव्यू: सुभाष कपूर की दमदार कोर्टरूम ड्रामा फिल्म, जिसमें किसान का मुद्दा, हंसी-मज़ाक और समाज का आईना सबकुछ दिखता है। अक्षय कुमार और अरशद वारसी की जोड़ी ने स्क्रीन पर मचाई धूम।"

बॉलीवुड की उन फिल्मों में जिनकी अगली कड़ी का लोग बेसब्री से इंतज़ार करते हैं, जॉली एलएलबी 3 सबसे ऊपर खड़ी रहती है। सुभाष कपूर की इस नई फिल्म ने साबित कर दिया कि उनकी पकड़ सिर्फ हंसाने या चुटकुले परोसने में नहीं, बल्कि तीखे सवाल उठाने में भी बराबर की है। इस बार कहानी का मुद्दा सीधा दिल से जुड़ता है—किसान। और कहना गलत नहीं होगा कि लंबे वक्त बाद किसानों की आवाज़ को बॉलीवुड के बड़े पर्दे ने खुले दिल से सुना है।
फिल्म की जान एक बार फिर बनते हैं अक्षय कुमार और अरशद वारसी। दोनों ही कोर्टरूम के माहौल में ऐसा तड़का लगाते हैं कि हंसी और गंभीरता एक साथ बैलेंस होकर बाहर आती है। अदालत के भीतर होने वाली बहस देखने लायक है, जहां हल्के-फुल्के पंच भी हैं और ऐसे डायलॉग भी जिन पर सीधा सोचने पर मजबूर होना पड़ता है।
कहानी का केंद्र बिंदु एक किसान बनता है, जिसकी ज़मीन और ज़िंदगी सिस्टम की बेरुखी के बीच फंस जाती है। यही किरदार असल में दर्शक को यह अहसास दिलाता है कि भारत की असली आत्मा गांव और खेतों में बसती है। सुभाष कपूर ने किसान की पीड़ा और संघर्ष को उतनी ही ईमानदारी से दिखाया है, जितनी ताक़त से उन्होंने सत्ता और कानून की चालाकियों को परोसा।
फिल्म की बड़ी ताक़त उसकी स्क्रिप्ट है। कोर्टरूम ड्रामा में अक्सर मामला बोझिल होने लगता है, लेकिन यहां स्क्रिप्ट ऐसी है कि दर्शक की पकड़ एक पल भी ढीली नहीं होती। मजाक में छिपा मैसेज और मैसेज में छिपा मजाक—दोनों साथ-साथ चलते हैं। यही कारण है कि जॉली एलएलबी 3 सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि सोचने पर भी मजबूर करती है।
बॉक्स ऑफिस पर फिल्म पूरी तरह ‘मज़बूत ओपनिंग’ वाली बताई जा रही है। सुबह के शो से ही थियेटरों में भीड़ नज़र आने लगी थी, खासकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में। वहां लोग इसे सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि अपनी कहानी कहने वाला आईना मान रहे हैं।
कुल मिलाकर, जॉली एलएलबी 3 शानदार कोर्टरूम कॉमेडी-ड्रामा है, जो हंसी और आंखों को गीला करने वाले सच दोनों साथ परोसती है। फिल्म अपने साथ समाज का आईना लिए चलती है और यही इसे खास बनाता है।
